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दिशाहीन होती जा रही है इलेक्ट्रानिक मीडिया

Posted On: 18 Aug, 2012 Others में

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इक्कीसवीं सदी के भारत में मीडियावी चश्मे से देखने पर अब दो हिस्से साफ नजर आते हैं। एक है भारत जो आज भी गांवों में बसता है और दूसरा है इंडिया जो चकाचैंध भरे शहरों में रहता है। मंथन का केंद्र बिंदु मीडिया की भूमिका हो तो प्रिंट और इलेक्ट्रानिक को अलग अलग कर लेना वैचारिक रूप से सहूलियत भरा हो सकता है। युवाओं के इस देश में जब स्मार्ट फोन और टेबलेट्स की समीक्षा के पाठक हमारी कृषि नीति से अधिक हो तो प्रश्न सहज ही उठता है कि क्या हमने अपने लिए उचित देशकाल का निर्माण किया है? इस संबंध में प्रिंट मीडिया की भूमिका को लेकर चर्चा करना इतना उपयोगी नहीं है जितना न्यूज चैनलों की। चूंकि न्यूज चैनल अभी इस स्थिती में हैं कि वह अपनी दिशाहीनता को त्याग कर लक्ष्य निर्धारण कर सकें। इनका विस्तार अपने प्रारंभिक दौर में तो नहीं लेकिन बदले जा सकने के दौर में तो है ही।

आज भी भारत के एक बड़े हिस्से में केबल नेटवर्किंग सिस्टम नहीं है। हां यह अवश्य है कि सेट टाॅप बाक्स आने के बाद गांवों में डिजिटल न्यूज चैनल पहुंच गए हैं। लेकिन जब पूरे विश्व की मीडिया स्थानीय खबरों को प्रमुखता से दिखाने के जन स्फूर्त नियम को मान रहा है ऐसे में भारत का आम आदमी टीवी के चैखटे का उपयोग सास बहु के प्रोग्राम को देखने के लिए करता है। खबरों के लिए आज भी वह अखबारों पर ही अधिक विश्वास करता है। ऐसा इसलिए क्योंकि न्यूज चैनलों पर दिखाई जाने वाली सौ खबरों में आमतौर पर एक भी ऐसी नहीं होती जो उसे उसके आस पास के समाचारों से वाकिफ कराए। यही वजह है कि टीवी के चैखटे के साथ भारत में बसने वाले आम आदमी को अपनेपन का एहसास नहीं मिल पाता और न्यूज चैनलों को देखने की जगह किसी मनोरंजन करने वाले चैनल को देखना अधिक पसंद करता है। यह बात किसी से छिपी नहीं है और इसी का नतीजा है कि देश के कई चैनलों ने समाचारों के प्रस्तुतीकरण का तरीका मनोरंजक बना लिया है। खबरों में कृत्रिम तत्वों का समावेश किया जाता है ताकि इंडिया में बनी खबरों को भारत में भी देखा जाए।

न्यूज चैनलों पर भारत के लिए खबरों का अकाल पड़ रहा है। प्रश्न उठता है कि किस तरह से यह बात तर्कसंगत है। खबरें तो किसी के लिए भी खबर ही होती है। खबरों के साथ निकटता का सिद्धांत कार्य करता है। कोई समाचार आप के जितने निकट होगा उसमें आपकी उतनी ही रुचि होगी। यही वजह है कि अखबारों के स्थानीय संस्करण छपते हैं। समाचार पत्रों के लिए किसी समाचार को लिखते समय कोई भी अच्छा संपादक अपने रिपोर्टर को यही सलाह देता है कि वह समाचार में स्थानीय परिवेश के अनुसार एंगल की तलाश करे। समाचार के साथ जुड़ा यह दृष्टिकोण किसी भी व्यक्ति को समाचार पढ़ने के लिए आकर्षित कर सकता है। और यदि समाचार पढ़ लिया गया और उसमें समाई सूचना पढ़ने वाले तक उचित तरीके से पहुंच गई तो समझिए कि समाचार लिखने का उदेश्य पूरा हो गया। लेकिन तेजी से बढ़ रहे न्यूज चैनलों के परिवार के साथ अब भी यह नियम पूर्ण रूप से लागू नहीं हो पा रहा है।

न्यूज चैनलों के लिए यह एक दिशाहीन स्थिती है। यद्यपि न्यूज चैनलों ने नैना साहनी हत्याकांड से लेकर निठारी कांड तक एक अभियान छेड़ा हो लेकिन यह सोची समझी कार्यशैली से अलग हटकर एक घटनात्मक रिपोर्टिंग अधिक है। अन्ना के आंदोलन से यह तय हो गया कि भारत में न्यूज चैनलों अभी इस स्थिती में नहीं पहुंचे हैं कि दिल्ली के रामलीला मैदान को मिस्र का तहरीर चैक बनाया जा सके। जनआंदोलन खड़ा कर पाने में न्यूज चैनल आज भी अक्षम हैं। लगभग पंद्रह साल के अपने जीवनकाल में भारत के न्यूज चैनलों में से किसी भी एक न्यूज चैनल ने आज तक जनता के बीच इस बात की घोषणा नहीं की कि वह देश की जनता के बीच किस उदेश्य से आया है। जनसरोकारों के मुद्दे पर न्यूज चैनलों की कार्यप्रणाली स्पष्ट नहीं है। किसी विषय विशेष को लेकर की जाने वाली न्यूज चैनलों की रिपोर्टिंग का अहम हिस्सा उस समाचार की ठेकेदारी तक जा पहुंचता हैं। खबर का असर दिखाने की होड़ अधिक होती है और समाचारों को आखिरी पड़ाव तक पहुंचाने की ललक कम होती जा रही है।

दैनिक समाचार पत्र आज के अग्रलेख में बाबू विष्णु राव पराड़कर ने लिखा था कि हम किसी के निजि जीवन में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। इन पक्तिंयों के पीछे उन्होंने स्वामी विवेकानंद के उस वक्तव्य को आधार बनाया था जिसमें उन्होंने कहा था कि हमें किसी के सिर्फ सामाजिक जीवन से ही सरोकार रखना चाहिए। उसके व्यक्तिगत जीवन का हिसाब किताब तो परमेश्वर और वह व्यक्ति स्वयं कर लेगा। यह उद्बोधन न्यूज चैनलों के लिए कभी प्रेरणा दायक बन पायेगा?

संपूर्ण भारत के लोगों का टीवी के चैखटे के अपनापन पनप सके इसके लिए अब जरूरी हो गया है कि न्यूज चैनलों में इस बात पर चर्चा हो कि इस बार देश की कृषि नीति क्या है और क्या होनी चाहिए। सरकार ने गेंहूं का सरकारी क्रय मूल्य क्या रखा है और क्या होना चाहिए। प्रोफाइल तलाश करती खबरें समाचारों के वासनाकाल का प्रदर्शन करती हैं लेकिन भारत की बड़ी आबादी से देर होती खबरें न्यूज चैनलों के डरपोक दिल होने और अभिजात्य होने की कोशिश भी बयां करती हैं। आवश्यकता अब इस बात की है कि जब इंडिया में बैठ कर भारत के लिए समाचार तय किए जाएं तो उनके सामाजिक सरोकारों का भी निर्णय देश काल और परिस्थिती के अनुसार किया जाए। ऐसा न हो कि हम दिन भर दिल्ली के आईटीओ में हुए जलभराव को ही दिखाते रहे हैं और दूर किसी गांव में दुर्भिक्ष की खबरों के लिए हमारे पास समय ही न हो। न्यूज चैनलों को अपने प्रतिमान खुद गढ़ने होंगे।



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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
August 21, 2012

बेहतरीन और सही आकलन करता हुआ लेख !

Chandan rai के द्वारा
August 21, 2012

तिवारी जी , एक बेहतरीन लेख के लिए मेरा हार्दिक अभिनन्दन स्वीकार करें ! आपके विचारों से सहमती !

shailesh001 के द्वारा
August 21, 2012

बहुत ही सच्ची और महत्वपूर्ण कहा है आपने. साधुवाद।


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